36 दिन वेंटिलेटर पर बिताकर ज़िंदा बचने वाले कोरोना संकर्मित 52 वर्षीय शख़्स से मिलिए

     नितईदास मुखर्जी नामक मरीज़ दो सप्ताह से कोविड-19 से शहर के एएमआएआई अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे थे और डॉक्टर सास्वति सिन्हा वहां क्रिटिकल केयर में कंसल्टेंट थीं.
“वो आज रात शायद न बच पाएं. चीज़ें बहुत तेज़ी से बिगड़ी हैं.” कोलकाता में सुनसान सड़कों से अस्पताल लौटते हुए डॉक्टर सास्वति सिन्हा ने अपने मरीज़ की पत्नी से फ़ोन पर ये कहा.
ये 11 अप्रैल की रात थी. उस समय कोरोना वायरस के कारण देशभर में लॉकडाउन बेहद सख़्ती से लागू था.
52 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता नितईदास मुखर्जी बेघरों के लिए एक ग़ैर-लाभकारी संस्था चलाते हैं और वो कोरोना वायरस के कारण वेंटिलेटर पर थे. 30 मार्च की शाम वो तेज़ बुखार और सांस लेने में परेशानी होने के कारण अस्पताल पहुंचे थे.
एक मिनट में 50 बार सांस ले रहे थे
उनका एक्स-रे बेहद ही ख़राब स्थिति की ओर इशारा कर रहा था. उनके फेफड़ों की स्थिति बिलकुल ठीक नहीं थी. हवा के रास्तों में द्रव भर चुका था जिससे बाकी अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही थी. उस रात डॉक्टरों ने ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने के लिए हाई-फ़्लो मास्क का इस्तेमाल किया, उन्हें डायबिटीज़ की दवाएं दीं और कोविड-19 टेस्ट के लिए उनके गले से लार ली. अगली सुबह मुखर्जी टेस्ट में पॉज़िटिव पाए गए. अब उनको सांस लेने में बेहद तकलीफ़ हो रही थी और एक घूंट पानी पीना भी बेहद मुश्किल था. अधिकतर लोगों में सामान्य ऑक्सीजन का स्तर 94 फ़ीसदी से लेकर 100 फ़ीसदी तक होता है लेकिन उनमें ये स्तर गिरकर 83 फ़ीसदी रह गया था. प्रति मिनट 10 से 20 बार सांस लेना छोड़ना सामान्य है लेकिन मुखर्जी एक मिनट में ये 50 बार कर रहे थे. वो बेहोश हो गए तो उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया. इसके बाद वो तीन सप्ताह से अधिक समय तक वेंटिलेटर पर रहे और आख़िरकार जीवन रक्षक मशीन से उनको अलग किया गया.
बाकी मरीज़ों से कैसे ख़ुशकिस्मत निकले
गंभीर रूप से कोविड-19 से बीमार अधिकतर मरीज़ मुखर्जी की तरह ख़ुशकिस्मत नहीं होते. एक स्टडी के अनुसार, न्यूयॉर्क में जिन एक चौथाई मरीज़ों को सांस लेने के लिए वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ी, उनकी मौत इलाज के पहले सप्ताह में ही हो गई. एक ब्रिटिश स्टडी के मुताबिक़, जिन दो तिहाई कोविड-19 मरीज़ों को वेंटिलेटर पर रखा उनकी मौत हो गई थी. ऐसी भी रिपोर्ट थीं कि कोविड-19 मरीज़ों पर वेंटिलेटर्स ठीक से काम नहीं कर रहे हैं. बेल्ज़ियम के इराज़मे यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में इंटेसिव केयर मेडिसिन की प्रोफ़ेसर ज़्यां-लुईस विंसेट ने मुझे बताया, “कृत्रिम रूप से सांस देने के कुछ मामले में हमें बेहद ख़राब परिणाम मिले. सांस के लिए वायु देते रहने के दौरान फेफड़ों को नुक़सान हुआ. ख़ासतौर पर यह तब हुआ जब लोग सोचते हैं कि सांस लेने में नाकामी का संबंध सिर्फ़ एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम यानी एआरडीएस से होता है.”
एक रात एकाएक बदल गई चीज़ें
मुखर्जी जब वेंटिलेटर पर थे तो वो ‘मसल रिलेक्स्टेंट्स’ पर भी थे. इसमें दवाओं के ज़रिए मांसपेशियों को शक्तिहीन बना दिया जाता है ताकि मरीज़ ख़ुद से सांस लेने की कोशिश न करे. लेकिन एक अप्रैल की रात चीज़ें एकाएक बदल गईं. उनका बुख़ार बढ़ गया, हृदय गति और ब्लड प्रेशर गिरने लगा. ये सब चीज़ें एक नए संक्रमण की ओर इशारा कर रहे थे. ऐसे में वक़्त ज़ाया नहीं किया जा सकता था तो डॉक्टर सिन्हा ने अपनी क्रिटिकल केयर टीम को फ़ोन पर ही निर्देश दिए. जब वो वापस लौटीं तो मुखर्जी को बचाने की लड़ाई दोबारा शुरू हुई. डॉक्टर सिन्हा और उनकी टीम ने रक्त वाहिकाओं में संक्रमण को ख़त्म करने के लिए एंटिबायोटिक का शक्तिशाली ‘आख़िरी सहारा’ लिया. साथ ही साथ उन्होंने ब्लड प्रेशर स्थिर करने के लिए मसल रिलेक्स्टेंट्स और दवाओं का भी सहारा लिया. इस तूफ़ान को टलने में तीन घंटों का समय लगा. इंटेसिव केयर में 16 साल का वक़्त बिताने वाली डॉक्टर सिन्हा कहती हैं कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा ‘हाथ-पांव फुला देने वाला अनुभव’ था.
3 घंटे बिना रुके पीपीई किट में काम
वो कहती हैं, “हमें बेहद तेज़ी से और सही तरीक़े से काम करना था. पीपीई किट में हमें पसीने आ रहे थे और हमें धुंधला दिख रहा था. हम चार लोगों ने उस रात लगातार तीन घंटे बिना रुके काम किया. हम हर मिनट मॉनिटर की ओर देख रहे थे और देख रहे थे कि उनमें कितनी तब्दीली आ रही है. मैं ख़ुद से कह रही थी कि हम इस शख़्स को ज़िंदा रखना चाहते हैं. वो पूरी तरह बीमार नहीं हैं बल्कि वो सिर्फ़ एक कोविड-19 मरीज़ हैं जो आईसीयू में हैं.” मुखर्जी जब स्थिर हुए तब रात के दो बज रहे थे. डॉक्टर सिन्हा ने फ़ोन चेक किया तो उस पर मुखर्जी की पत्नी और उनकी रिश्तेदार की 15 मिस्ड कॉल थीं. उनकी रिश्तेदार न्यू जर्सी में सांस संबंधी बीमारियों पर शोध कर रही हैं.
नितईदास मुखर्जी की पत्नी और पेशे से ह्युमन रिसॉर्स मैनेजर अपराजिता मुखर्जी कहती हैं, “वो मेरी ज़िंदगी की बेहद भयानक रात थी. मैं सोच रही थी कि मैंने अपने पति को खो दिया है.” वो लॉकडाउन में अपने घर में 80 वर्षीय सास के साथ क्वारंटीन थीं. उनके साथ आंशिक रूप से विकलांग उनकी चाची भी थी लेकिन इनमें से कोई भी कोविड-19 पॉज़िटिव नहीं पाया गया.
पूरी तरह नहीं टला था ख़तरा
उस समय आई एक कठिनाई टल तो चुकी थी लेकिन मुखर्जी की स्थिति अभी भी गंभीर थी. मुखर्जी का वज़न अधिक था और अधिक वज़न वाले मरीज़ों को करवट करने में थोड़ी मुश्किल होती है ताकि उनको सांस मिल सके. डॉक्टरों ने उन्हें हाइड्रोक्सिक्लोरोक्विन दी जो आमतौर पर मलेरिया के मरीज़ों को दी जाती है. इसके साथ उन्हें विटामिन, एंटिबायोटिक्स और कुछ अन्य दवाइयां दीं लेकिन उनका बुख़ार बना रहा. आईसीयू में मुखर्जी के बिस्तर से हर रात अलार्म ज़रूर बजता था. कभी ऑक्सीजन की मात्रा गिर रही होती थी तो कभी एक्स-रे मशीन में उनके फेफड़े ‘सफ़ेद’ दिखने लगते थे. डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, “उनकी सेहत में थोड़ा सुधार था और जब कभी सुधार दिखता भी था तो वो बेहद धीमा होता था.”आख़िरकार अस्पताल में भर्ती होने के एक महीने बाद मुखर्जी में संक्रमण से लड़ने के लक्षण दिखने लगे. आख़िरकार वो रविवार को होश में आए. उनकी पत्नी ने उन्हें वीडियो कॉल किया तो वो फ़ोन पर टकटकी लगाए देखते ही रहे.
‘मुझे लगा कि किसी ने क़ैद किया हुआ है’
मुखर्जी ने मुझे बताया कि उन्हें कोई आइडिया नहीं था कि क्या कुछ चल रहा है. वो कहते हैं, “मेरे सामने सब धुंधला था. मैंने अपने सामने नीली वेशभूषा में खड़ी एक महिला देखी थी, बाद में मैंने पाया कि वो मेरी डॉक्टर है. आप जानते हैं, मैं तीन हफ़्तों तक सोता रहा. मुझे कोई आइडिया नहीं है कि मैं अस्पताल में क्यों था? मेरी पूरी याद्दाश्त ग़ायब है. लेकिन मुझे कुछ याद है. मैं जब कोमा में था तब मैं किसी भ्रम में था. मुझे लगता था कि मैं कही क़ैद हूं, मुझे रस्सियों से बांधा हुआ है और लोग मुझे कह रहे हैं कि मैं ठीक नहीं हूं. वो मेरे परिवार से पैसे ले रहे हैं और मुझे छोड़ नहीं रहे हैं. और मैं मदद के लिए लोगों से संपर्क करने की कोशिशें कर रहा हूं.” अप्रैल के आख़िर में मुखर्जी को वेंटिलटर से हटाया गया और उन्होंने तक़रीबन एक महीने बाद ख़ुद सांस ली. डॉक्टर कहते हैं कि वेंटिलेटर से हटाकर ख़ुद सांस लेना मुखर्जी के लिए मुश्किल भरा था क्योंकि उन्हें अक्सर ‘पेनिक अटैक’ आ जाया करते थे और वो आपातकालीन घंटी बजा देते थे. उन्हें लगता था कि वो मशीन के बिना सांस नहीं ले पा रहे हैं. 3 मई को उनका वेंटिलेटर बंद कर दिया गया और पांच दिनों बाद उन्हें घर भेज दिया गया. डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, “यह वास्तव में एक लंबी दौड़ थी. उन्हें गंभीर एआरडीएस था. उन्हें चार सप्ताह तक तेज़ बुख़ार रहा. वो ख़ुद से सांस नहीं ले पा रहे थे. वायरस तेज़ी से उनको अपनी गिरफ़्त में ले रहा था.”
‘वायरस को हराया जा सकता है’
अब घर में मुखर्जी अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर रहे हैं. वो अब बिना किसी की मदद के चलना शुरू कर रहे हैं. उनकी बहुत सी याद्दाश्त वापस लौट रही है. अस्पताल ले जाने से पहले वो कई दिनों तक खांस रहे थे और एक डॉक्टर को उन्होंने दिखाया था जिसने कहा था कि ये गले का संक्रमण है. वो काम पर जा रहे थे, फ़ेस मास्क पहन रहे थे और ग़रीब-बेघरों का ख़याल रख रहे थे. वो काम के सिलसिले में अस्पताल, पुलिस स्टेशन और शेल्टर होम्स जाते थे. वो अपनी डायबिटीज़ की दवाएं छोड़ रहे थे जिसके कारण अस्पताल में भर्ती के समय उनका ब्लड ग्लूकोज़ एकदम नीचे आ गया. वो एंटिबायोटिक और नेबुलाइज़र ले रहे थे, क्योंकि हर बार मौसम बदलने पर खांसी होने पर वो इसे लेते थे. मुखर्जी की पत्नी कहतीं हैं, “लेकिन तब मुझे कुछ ग़लत लगा जब उन्हें डिहाइड्रेशन और घंटों तक सोने की शिकायत हुई. वो बेहद थके हुए थे. और उसके बाद सांस लेने में समस्याएं होने लगीं और हमने उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाया और अस्पताल ले गए.” पिछले सप्ताह 82 दिनों तक कोविड-19 मरीज़ों के आईसीयू में रहने के बाद डॉक्टर सिन्हा ने छुट्टी ली. उनकी टीम ने 100 से अधिक मुखर्जी की तस्वीरें ली हैं ताकि उनकी टीम इस जंग को याद रखे. इन तस्वीरों में पीपीई किट में थकी हुई नर्सें, मुखर्जी के बिस्तर के नज़दीक मुस्तैद स्वास्थ्यकर्मी, जिस दिन मरीज़ को होश आया, जिस दिन उन्हें वेंटिलेटर से हटाया गया और जब उन्होंने अस्पताल छोड़ा, ये सब तस्वीरें हैं. डॉक्टर सिन्हा कहती हैं, “हम एक टीम के नाते आख़िर में बस अपना काम कर रहे हैं.” मुखर्जी ख़ुश हैं कि वो ख़ुद सांस ले पा रहे हैं. वो कहते हैं, “मैं जानता हूं कि मैं बीमारी से लड़ा हूं लेकिन डॉक्टरों और नर्सों ने मेरी ज़िंदगी बचाने के लिए लड़ाई की है. ज़िंदा बचे लोगों को अपनी कहानियां सुनाने की ज़रूरत है. इस वायरस को हराया जा सकता है.”

इलाज के दौरान डॉ सास्वति सिन्हा और उनकी टीम