साक्षी- हारने पर निगेटिव विचार आए तो क्या करें, योगेश्वर का जवाब- आपकी कमजोरी में ही ताकत भी छिपी है, उसे पहचानें

  • हरियाणावी मिट्‌टी से निकले दो दिग्गज पहलवान लॉकडाउन में हुए रूबरू
  • दैनिक भास्कर के हरियाणा में 20 साल पूरे होने पर खास इंटरव्यू

पानीपत. लंदन ओलिंपिक के सिल्वर मेडलिस्ट रेसलर योगेश्वर दत्त और रियो ओलिंपिक में ब्रांज मेडलिस्ट साक्षी मलिक। दोनों ने अपने जीवन के उतार-चढ़ाव वाले पल हमसे शेयर किए, साथ ही एक-दूसरे का हौसला भी बढ़ाया।

साक्षी: बाउट खराब होने पर निगेटिव विचार घेर लेते हैं। लगता है, अब नहीं हो पाएगा… आप ऐसे में क्या करते हैं?
योगेश्वर:
खुद को रिव्यू करना पड़ता है। 2004 ओलंपिक से पहले मैं एक पहलवान से कमजोर ग्रिप के चलते लगातार तीन बार हार चुका था, इसलिए मैंने 2 से 3 महीने केवल ग्रिप पर काम किया। उसी साल ओलिंपिक क्वालीफाइंग ट्रायल में सामने वही पहलवान था। तीन मिनट बाद मैंने ग्रिप का फायदा उठा सीधा 4 पॉइंट का दांव मार दिया और क्वालीफाई कर लिया। एशियन गेम्स के दौरान पैरों में तकलीफ थी। जब तक खड़ा रहकर लड़ पाता लड़ता, नहीं तो घुटने टेक कर लड़ता था। यह एक अलग तरह की शैली विकसित हो गया, जिसे विरोधी पहलवान समझ नहीं पाते। जहां कमजोरी होती है वहीं एक ताकत भी छिपी होती है।

योगेश्वर: पिछले दिनों एक ही खिलाड़ी से दो कुश्ती हारीं। अब क्या रणनीति है?
साक्षी :
मेरी गर्दन कमजोर है और वहां से मैं पजल हो जाती हूं। इसी पर काम कर रही हूं। मैं आगे चल रही होती हूं तो डिफेंसिव हो जाती है।

योगेश्वर की सलाह : खिलाड़ी को अपनी स्ट्रेंथ दिखानी चाहिए। लड़ने की शैली ऐसी रखो कि 6 मिनट तक वैसे ही लड़ सको और मौका मिलते ही अटैक कर दो। आपको कोई लट्ठ मारेगा और आप बचते रहोगे तो 10 में से 1 लट्ठ तो जरूर लगेगा। अगर बराबर मारोगे तो उसके भी जरूर लगेंगे। इसलिए जब भी कोई पहलवान अटैक करता है तो हमें डिफेंस करने की जगह काउंटर अटैक शुरू करें।

योगेश्वर का सवाल : लॉकडाउन आप पति सत्यव्रत के साथ प्रैक्टिस क्यों नहीं करतीं?
साक्षी: मुस्कराते हुए
…नहीं जी, ज्यादा अंतर हो गया वेट का। अगर थोड़ा अंतर होता तो जरूर कर लेती। मैं 62 किलो की हूं और ये 97 किलो के।

योगेश्वर : सत्यव्रत को वजन कम करना चाहिए, ताकि आप प्रैक्टिस कर सकें।
साक्षी : हंसते हुए
… बोलूंगी जी उनको जरूर।

सवाल: लाइफ का सबसे कठिन दौर और उससे कैसे उबरे?
योगेश्वर :
2006 एशियन गेम्स में जाने से 2 दिन पहले मेरे पिताजी का देहांत हाे गया। ऐसे में जाना कठिन था। तब मेरी मां और गुरुजी ने कहा कि तेरे पिताजी का सपना था कि तू एशियन गेम्स में खेले और गोल्ड जीते। मैं वहां ब्रॉन्ज जीता। बाद में सपना 2014 में गोल्ड से पूरा किया।
साक्षी: 2014 में घुटने में इंजरी हुई और हौसला टूट गया। तब फिजियो व डाॅक्टर ने समझाया। ऑपरेशन सही हुआ और मेहनत से मेडल जीत लाई।

सवाल: कोरोना से बदले हालातों में कुश्ती में क्या बदलाव हो सकते हैं?
योगेश्वर :
सबसे मुश्किल दौर है। खासकर कुश्ती और जूडो जैसे खेलों के लिए। हम फिटनेस पर तो काम कर रहे हैं लेकिन खेल से गैप बढ़ता जा रहा है। हर खिलाड़ी को विपक्षी खिलाड़ियों की जानकारी से अपडेट रहना जरूरी है।

सवाल: आप ओलिंपिक की दौड़ में हैं, प्रैक्टिस पर क्या असर हुआ है?
साक्षी:
इस समय प्रैक्टिस के लिए पार्टनर्स की कमी है। लेकिन असर सिर्फ हम पर नहीं, अन्य देशों के खिलाड़ियों पर भी हुआ है।

सवाल: कोरोना के कारण ट्रेनिंग की प्रक्रिया में क्या बदलाव आए हैं?
योगेश्वर :
पहले 40 से 50 पहलवान एक साथ प्रैक्टिस करते थे। अब घरों के अंदर ही प्रैक्टिस कर रहे हैं। लेकिन घर में तो केवल फिजिकल ट्रेनिंग हो सकती है कुश्ती नहीं। पार्टनर के साथ प्रैक्टिस नहीं हो पाने की कमी खल रही है।

सवाल: फेडरेशन क्या बदलाव कर सकती है मौजूदा दौर में?
साक्षी :
साई ने ट्रेनिंग के कुछ नियम तय किए हैं। सर्कुलर में है कि हम डमी के साथ प्रैक्टिस कर सकते हैं। एक समय में मैट पर एक ही बंदा प्रैक्टिस कर सकता है।

सवाल: जब ओलंपिक में मेडल जीता तो वो लम्हा कैसा था?
साक्षी:
कुश्ती मैंने तो शुरू ही इसलिए की थी कि मुझे हवाई जहाज में बैठना था। फिर मेडल आने शुरू हुए तो कुश्ती से लगाव हो गया। 2016 में ओलिंपिक जीतने के लम्हे को मैं शब्दों में नहीं बता सकती। जीतने के 10 मिनट बाद अहसास हुआ कि मेरा सपना पूरा हो गया है।

योगेश्वर: 2012 में मैंने मेडल जीता तो बहुत खुशी हुई। बाद में पता चला कि सिल्वर मेडल जीतने वाले खिलाड़ी डोप में पॉजिटिव आए हैं और उनका मेडल मुझे मिलेगा। तब खुशी नहीं हुई। मैंने तो मना भी किया था। मेरे मना करने के बाद इंडियन और रसियन लोगों ने जो मुझे प्यार दिया, उससे मुझे बहुत ज्यादा खुशी हुई।