रिटायरमेंट के दिन नाबार्ड के चेयरमैन बोले- अब मशीनों का प्रयोग बढ़ेगा, आसान होंगे काम और आमदनी भी बढ़ेगी

  • नाबार्ड के सफलतम चेयरमैन सोनीपत के हर्ष भानवास से विशेष बातचीत
  • हरियाणा में दैनिक भास्कर अखबार ने पूरे किए 20 साल

पानीपत. अभावों में पलकर ऊंचाई को छूने वाली शख्सियत नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष भनवाला की जिंदगी आत्मविश्वास की एक बेमिसाल कहानी है। आज इनसे ही जानते हैं इनके रोमांचक सफर के बारे में…

सवाल: कोरोना के दौर में हरियाणा के कृषि क्षेत्र में चुनौतियों के साथ क्या अवसर भी आए हैं?
जवाब:
हां! अब मशीन-तकनीक का प्रयोग और बढ़ेगा, तो किसानों की आय भी बढ़ेगी, काम भी आसानी से होंगे।

सवाल : सोनीपत के गांव कासंडी से नाबार्ड के चेयरमैन तक का सफर कैसा रहा?
जवाब:
मैं गांव में सातवीं तक पढ़ा। फिर राई स्पोर्ट्स स्कूल में। एनडीआरआई से डेयरी टेक्नॉलॉजी में बीटेक के बाद आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया। यहीं से नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक) में ग्रुप बी का अफसर बना। 22 साल नौकरी की। अंतिम पोस्ट जीएम की थी। 5 साल डेपुटेशन पर दिल्ली स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक का एमडी रहा। बैंक लॉस में था, जिसे प्रॉफिट में लाने के बाद छोड़ा। फिर मैनजेमेंट में पीएचडी की। 20में वॉलेंटरी रिटायरमेंट ली। फिर कई संस्थाओं में प्रेजिडेंट व सीएमडी रहा। 2013 में नाबार्ड का चेयरमैन बना। कार्यकाल इसी 27 मई को पूरा हुआ। यह किसी भी चेयरमैन का सबसे लंबा कार्यकाल है।

सवाल: कोरोना से चुनौतियां व अवसर?
जवाब:
चुनौतियों में अवसर भी छिपे होते हैं। इस संकट में मजदूर चले गए हैं, जो जल्द वापस नहीं आएंगे। इसलिए तकनीक और मशीन का उपयोग बढ़ेगा, काम जल्द और आसान होंगे। गेहूं कटाई व खरीद को देख लीजिए, कितनी जल्द व आसानी से गए। पहले किसान खुद के लिए छोटा ट्रैक्टर खरीदता था, अब बड़े ट्रैक्टर और मशीनें खरीदेंगे। इससे आसपास सर्विस देकर इनकम करेंगे। इसपर काम चल रहा है। नाबार्ड फंडिंग को तैयार है।

सवाल: हरियाणा के लिए क्या किया?
जवाब :
हरियाणा के विकास में नाबार्ड भूमिका निभाए, यह प्रयास रहा। अभी हरियाणा सरकार को ग्रामीण विकास के लिए 2.95 प्रतिशत पर ऋण दे रहे हैं, जो बाजार में उसे 7 या 6.75 प्रतिशत की दर पर मिलता है। पहले करीब 400 करोड़ का ऋण मिलता था। हम करीब 1200 करोड़ सालाना दे रहे हैं। इसका श्रेय सरकार को भी जाता है।

सवाल: पद छोड़ने से पहले ग्रामीण विकास या कृषि की किस बड़ी योजना पर काम किया?
जवाब:
हाल ही में टप्पा सिंचाई योजना को एक हजार करोड़ का फंड देने का प्लान बनाया है। इससे पानी की अच्छी बचत होगी। इस पर सरकार से 50 % सब्सिडी मिलती थी, इसलिए किसान लेते नहीं थे। अब 85% सब्सिडी देने की योजना है। इससे ज्यादा से ज्यादा किसान इसको लेंगे। पंप सेट्स को सोलर से जोड़ने की भी योजना है। मोरनी के लिए माइक्रोवाटर प्रोजेक्ट अंतिम स्टेज पर है। हरियाणा में छोटे किसान बहुत हैं, इनके एफपीओ (फॉर्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन यानी किसान उत्पादक संगठन) में सरकार के साथ नाबार्ड का भी योगदान है। एक एफपीओ के लिए हम 20 लाख की ग्रांट देते हैं।

सवाल : अब आपका आगे का फ्यूचर प्लान है?
जवाब :
मेरे पास सरकार व प्राइवेट संस्थाओं की तरफ से कई ऑफर हैं। लेकिन कुछ दिन बाद इनके बारे में सोचूंगा। कोशिश रहेगी कि सरकार अच्छा करने का मौका देगी तो समाज के लिए कुछ करेंगे।

सवाल : इस सफर में आपके सामने क्या चुनौतियां आईं और कैसे पार पाए।
जवाब:
मध्यम से भी जो निचला स्तर है, मैं उस परिवार से था। तीन भाई बहन थे। बहुत कम में काम चलाना पड़ता था। लेकिन इसी सब से जूझते हुए लक्ष्य स्पष्ट भी होता गया। राई स्कूल में पर्सनैलिटी डेवलप हुई और नेतृत्व क्षमता आई। परिवार आर्य समाज जुड़ा है तो घर में रोज हवन होता रहता है। इससे अच्छे विचारों व एथिकल वैल्यू के साथ बचपन विकसित हुआ। जब आईआईएम अहमदाबाद में गया तो वहां देशभर के टॉपर थे और हम ग्रामीण क्षेत्र से गए थे। इससे चैलेंज तो था लेकिन मन में था कि किसी हालत में मुझे इससे पार पाना है। मैं रात रात भर पढ़ता था। युवाओं से अपील है कि मेहनत करें। आसान रास्ते की तरफ न भागें। कठिन रास्ता पार कर लक्ष्य मिलता है, उसका आनंद भी अलग ही होता है।

सवाल: फूड प्रोसेसिंग में हरियाणा इजराइल के लेवल पर जाने के लिए क्या करे।
जवाब:
अच्छी तकनीक का प्रयोग। तकनीक हर किसान तक पहुंचे। डिजिटल माध्यम से कृषि का विस्तार हो। छोटे किसान एकत्र हों और एफपीओ बनाएं। इससे उनकी ताकत बढ़ेगी और खर्च कम होगा। मार्केट के साथ मिलकर एक्सपोर्ट भी कर सकेंगे।

सवाल: वो उपलब्धि जिसने सबसे ज्यादा खुशी दी?
जवाब:
नाबार्ड का पहली बार क्लाइमेट चेंज के लिए चुना जाना। यूनाइटेड नेशन का ग्रीन क्लाइमेट फंड है। उससे एक्रेडिटेशन काफी मुश्किल होता है। 2015 में नाबार्ड टॉप 20 में था तो इसका सदस्य बना। इसके बाद इससे सीधे फंड प्रयोग कर सकते थे। दूसरा को-ऑपरेटिव बैंक और आरआरबी में जो कंप्यूटर लगे हैं, इसकी प्लानिंग और फंडिंग मेरे समय में हुई। यह मुश्किल काम था। क्योंकि तकनीक आदमी एकदम से नहीं अपनाता। दूर-दराज इलाकों में नेटवर्क की दिक्कत थी, वहां सेटेलाइट की सुविधा दी और छतरी लगाने के लिए फंडिंग की। इससे बैंकिंग घर-घर तक ले जाने का सपना पूरा हुआ।