जवानों का साथ देने के लिए 100-100 किमी. पैदल चलता हूं, बेटी ने किया मोटीवेट : देसवाल

  • 71 की लड़ाई नदी-नाले पार कर 13 दिन में पैदल जीतना सैन्य इतिहास में बड़ी उपलब्धि: वीके सिंह
  • दैनिक भास्कर के हरियाणा में 20 साल पूरी होने पर देश की दो चर्चित शख्सियत का इंटरव्यू

पानीपत. भास्कर हरियाणा में 20 साल पूरे कर चुका है। इस खास मौके पर आप से मुखातिब हैं हरियाणा के दो मैसकॉट्स, लिविंग लीजेंड्स जनरल वीके सिंह, केंद्रीय राज्य मंत्री हैं और पूर्व सेना प्रमुख भी। एसएस देसवाल, जो आईटीबीपी और बीएसएफ के डीजी हैं।

सवाल: कोरोना के चलते विदेशों में फंसे भारतीयों की वतन वापसी के लिए लंबा ऑपरेशन चला। इसमें आईं चुनौतियां के बारे में बताएं?
जनरल वीके सिंह:
कई मिशन में हम बाहर से अपने लोगों को ला चुके हैं। हम लीबिया से लोगों को निकालकर लाए। उसके बाद सीरिया, ईराक और युक्रेन से। यमन से जब लोगों को निकाला तो लड़ाई शुरू हो चुकी थी। इन परिस्थितियों में प्राथमिकता देखनी होती है। 6 सालों में सरकार ने स्पष्ट किया है कि आप दुनिया के किसी भी कोने में दिक्कत में हैं तो हम आपको वापस लाने में दृढ़संकल्प है।

सवाल: आईटीबीपी पहली फोर्स थी जिसने मजबूती से कोरोना वॉरियर की भूमिका निभाई। अब कोरोना कितनी बड़ी चुनौती है?
एसएस देसवाल:
जनवरी में जब ये शुरू हुआ। तब जरूरत थी क्वारेंटाइन सेंटर की। दिल्ली में आईटीबीपी ने 1000 लोगों की कैपेसिटी का सेंटर बनाया। तब पहला ग्रुप वुहान से आया, उन्हें हमने होस्ट किया। जिसमें बच्चे, फैमिली व स्टूडेंट्स थे। तब तनाव बहुत ज्यादा था तो जरूरत थी कि देश को भरोसा दिलाया जाए। इस सेंटर पर रुके लोगों में 7 अन्य देशों के नागरिक भी थे।

सवाल: यंग इन्फेंट्री ऑफिसर रहते कौन-सा ऑपरेशन आपको सबसे चुनौतीपूर्ण लगा? सबसे मुश्किल पोस्टिंग?
जनरल वीके सिंह:
हर पोस्टिंग की चुनौतियां होती हैं। 1970 में मुझे कमीशन मिला और 1971 की भारत-पाक लड़ाई में भाग लेने का मौका। भारतीय सेना का प्रदर्शन जो मॉनेकशॉ के कमांड में हुआ, वैसा सैन्य इतिहास में कहीं नहीं हुआ है। खासकर बांग्लादेश में जहां नदी, नाले और कटाव हैं। बिना मैकेनाइज्ड फोर्स के 13 दिन में पैदल दुश्मन को परास्त करना और 93 हजार कैदी बनाना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। लोगों को इसे और समझने की जरूरत है। श्रीलंका की पोस्टिंग भी बेहद अहम थी। वहां दो साल रहा। वहां अलग तरह का युद्ध था।

सवाल: आपकी फिटनेस की कायल सभी फोर्सेस हैं। जवानों तक पहुंचने के लिए 100-100 किमी. पैदल चल चुके हैं? कैसे हो पाता है यह?
एसएस देसवाल-
इंडो-तिब्बत बॉर्डर दुनिया की सबसे मुश्किल सरहद है। हाईट और मौसम की वजह से ऑक्सीजन कम है। 3500 किमी. पर आईटीबीपी की पोस्ट हैं। हमारी टीम बॉर्डर को पैट्रोलिंग से ही कवर करती है। काफी बीओपी (बॉर्डर आउट पोस्ट) एयरबॉर्न हैं, कोई रास्ता नहीं है। घने जंगल हैं। जवानों की पैट्रोलिंग कई जगह 20-20 दिन में पूरी होती है। ऐसे में लीडरशिप की जिम्मेदारी है कि जवानों तक जाकर उनकी दिक्कतों को सुलझाऊं। इसलिए मुझे अपनी कैपेसिटी बढ़ानी पड़ी। 4-5 साल से मेरी बेटी (शूटर यशस्विनी) ने नेशनल- इंटरनेशनल में पार्टिसिपेट करना शूरू किया है तो उसके साथ मैं वक्त मिलने पर फिजिकल एक्सरसाइज करता हूं। इसके लिए मोटिवेट करने में मेरी बेटी का बड़ा हाथ हैं।

सवाल: यूएस के प्रसिद्ध रेंजर स्कूल में दाखिल होना और वहां से पास होने वाले कम ही हैं। वहां क्या इतना कठिन होता है?
जनरल वीके सिंह:
वास्तविकता के सबसे करीब ट्रेनिंग के लिए रेंजर स्कूल का दुनिया में अलग नाम है। जिस तरह के ऑपरेशन करते हैं ठीक वैसी सिचुुएशन में ट्रेनिंग रेंजर स्कूल में दी जाती है। वहां राजा और रंक सब एक हैं। कोर्स शुरू हुआ तो 300 लोग थे। बाद में 90 ही बचे थे।

सवाल: आपकी बेटी ओलिंपिक क्वालिफायर हैं। कैसे मदद करते हैं आप?
एसएस देसवाल:
हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है। जय किसान है। अपनी जरूरत से ज्यादा किसान अन्न पैदा करता है। उसी किसान का बेटा सोल्जर है। जितने भी युद्ध हुए हरियाणा के सोल्जर ने बलिदान दिया है। और तीसरी कैटेगरी है जय पहलवान। जवान के बच्चे स्कूल में हैं। पूरे देश में हरियाणा की जनसंख्या करीब 2% है। 35-40% स्पोर्ट्स में हरियाणा का योगदान दिया है। भरोसा है वो आगे हमारा नाम ऊंचा करेंगे। चाहे बेटे हों या बेटियां।

सवाल: भिवानी के बापोरा से यहां तक। इसके लिए खुद में क्या बदलाव किए?
जनरल वीके सिंह:
बदलाव हर कदम पर होता है, जो नहीं बदलता वो है अपनी मिट्‌टी से लगाव। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ तक पहुंचने में मैंने महसूस किया तन्मयता और ईमानदारी से काम करते हैं तो कोई रोकेगा नहीं। हमारा गांव फौजियों का है। पहले कहा जाता था जो पढ़ लेता है वो आगे निकल जाता है जो नहीं पढ़ता वो फौज में जाता है। और जो फौज में फिट नहीं बैठता वो किसानी करता है। मैंने इस सोच को तोड़ने की काेशिश की। मैं पिलानी में पढ़ रहा था और वहीं से एनडीए गया।

सवाल: पानीपत के अटावला से आज जिस पोजिशन पर आप हैं वहां क्या सबसे चुनौतीपूर्ण रहा और उसे कैसे बदला आपने?
एसएस देसवाल:
एजुकेशन सबसे जरूरी है, जो लगातार सीखेगा वो आगे बढ़ता रहेगा। हमारी जो भी उपलब्धि है, वह इसी वजह से है। अलग होने के बाद जो हरियाणा ने किया वो बाकी ने दस साल बाद शुरू किया।

सवाल: क्या खासियत आप हरियाणा के लोगों में देखते हैं जो हर फील्ड में वो अच्छा करते हैं?
एसएस देसवाल:
बेसिक एटीट्यूड है, वो मेहनत का है। मुश्किलों को कैसे अवसर समझकर हम उन्नति करते हैं। मेहनत बेसिक बैकग्राउंड भी है। चाहे खेती हो फौज हो। और देश के प्रति जो हमारा डेडिकेशन है वो सबसे ज्यादा है।