रोटी मिली न रोजगार, मजदूरों के लिए क्यों रुक से गए मदद के लिए बढ़े हाथ

  • प्रशासन के दावे के विपरीत 40 हजार से ज्यादा परिवारों को राशन व भोजन की दरकार, छोटी फैक्ट्रियाें में और घरेलू नौकरानियों का काम शुरू नहीं से उधार व जुगाड़ से चल रही जिंदगी
  • हिसार बाईपास, सैनिक कॉलोनी, हरकी देवी कॉलोनी जैसी जगहों पर नहीं पहुंची पूरी मदद

रोहतक. कोरोना की वजह से दो माह से चल रहे लॉकडाउन में मजदूर तबका बुरी तरह परेशान है। प्रशासन ने एनजीओ के माध्यम से हजारों राशन के पैकेट भी बंटवाए। लॉकडाउन 4 में फैक्ट्रियां खुलने की अनुमति देने के बाद प्रशासन ने दावा किया कि 1298 फैक्ट्रियाें में 52 हजार श्रमिकों को रोजगार मिल गया है। कंट्रक्शन का काम भी चालू हो गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर हकीकत यह है कि अभी इन फैक्ट्रियों ने मंजूरी तो ले ली है, लेकिन पूरी तरह चालू नहीं होने से यहां इतने श्रमिकों को काम नहीं मिल पाया है। इनके अलावा भी सैकड़ों छोटी फैक्ट्रियां अब भी बंद हैं। हजारों घरेलू नौकरानियों को अभी काम पर नहीं बुलाया जा रहा। वहीं, काम शुरू होने की बात मानकर प्रशासन और समाजसेवी संस्थाओं ने भी राशन वितरण कम कर दिया है। ऐसे में हजारों परिवारों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया है। वहीं, हजारों की संख्या में एेसे परिवार भी हैं, जहां अब तक एक बार भी मदद नहीं पहुंची। उधार और जुगाड़ के सहारे ही उनकी गाड़ी चल रही है। प्रशासन को एक बार फिर राशन वितरण का तंत्र सक्रिय करने की जरूरत है ताकि दो माह तक जिस भाव से रोहतक वासियों ने इन प्रवासियों की मदद की है, वह जज्बा आखिर तक बना रहे। मजदूरों को कम से कम भूख के चलते तो पलायन को मजबूर न होना पड़े।

सीटू का दावा-40 हजार प्रवासी मजदूरों को चाहिए रोजगार-राशन

मजदूरों के संगठन सीटू के सर्वे के अनुसार रोहतक में लगभग एक लाख प्रवासी मजदूर रहते हैं। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन की अवधि में अब तक करीब 40 हजार प्रवासी मजदूर पलायन कर चुके हैं, जबकि लगभग 60 हजार मजदूर अभी शहर में हैं। इसमें 20 हजार ऐसे मजदूर हैं। जिनको छिटपुट काम मिलने लगा है, जबकि 40 हजार के लगभग ऐसे श्रमिक हैं जिन्हें आज भी रोजगार और राशन दोनों की जरूरत है।

प्रशासन के आंकड़े बता रहे-सभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंची राहत

प्रशासन की ओर से एनजीओ की मदद से अभी तक 26155 राशन के पैकेट बांटे गए हैं। इन राशन के पैकेट में पांच लोगों के लिए एक सप्ताह का राशन है। यानी यदि दो माह तक एक परिवार की मानें तो उसे 8 पैकेट राशन की जरूरत होगी। इस तरह 3300 परिवारों का ही हम पेट भर पाए। वहीं, प्रशासन का दावा है कि एनजीओ के माध्यम से 16 लाख 65 हजार खाने के पैकेट बांटे गए। यह खाने के पैकेट भी पांच सदस्यों वाले 3000 परिवारों को दो वक्त का खाना ही दे पाए। जबकि रोहतक शहर में करीब एक लाख परिवारों को मदद की जरूरत थी। अब उसमें से प्रशासन का दावा है कि 52 हजार परिवारों काे काम मिल गया है। करीब 10 हजार अपने घर लौट चुके हैं। ऐसे में अब भी हजारों परिवार ऐसे हैं जहां मदद की जरूरत है।

किरयाने वाले व दोस्तों से उधार लेकर चलाया काम : शंभू

हरकी देवी कॉलोनी में रह रहे शंभू पासवान बच्चों की बेहतर परवरिश और रोजगार की तलाश में दो साल पहले रोहतक आए। शुरुआत अच्छी रही। दिहाड़ी मजदूरी मिलती रही। इससे जिंदगी पटरी पर लौटने लगी, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन ने कमर तोड़ दी। घर में पत्नी और तीन बच्चों के लिए दो टाइम का भोजन का प्रबंध मुश्किल हो गया। सरकार से भी मदद नहीं मिल रही।

लोग लाइन में लगे रहे, नहीं मिला राशन : खुशबू

बिहार के बेगूसराय निवासी खुशबू देवी ने बताया कि वे हरकी देवी काॅलोनी में रहते हैं। पति की दिहाड़ी मजदूरी की कमाई से परिवार चलता था। जनता कर्फ्यू के दिन से काम बंद है। जिला प्रशासन की ओर से आज तक कोई मदद नहीं मिली है। कॉलोनी में कई बार राशन बांटने के लिए गाड़ी आई। लेकिन कुछ लोगों में ही राशन बांटकर चली गई।