संयोग: कल शनि जयंती व वट सावित्री व्रत एक साथ

  • तेल का अभिषेक संभव न हो तो इमरती व तेल में तली वस्तुएं, श्रीफल भोजन आदि जरूरतमंदों में बांटे

अम्बाला. हिंदू पंचांग के अनुसार 22 मई काे ज्येष्ठ मास की अमावस्या है। इस दिन शुक्रवार काे कृतिका नक्षत्र शाेभ याेग काे शनि जयंती मनाई जाएगी। पंडित विकास शास्त्री के अनुसार शनि काे सूर्य का पुत्र माना जाता है व ज्येष्ठ मास की अमावस्या काे ही सूर्यदेव एवं छाया की संतान के रूप में शनि का जन्म हुअा था। ज्याेतिषी गिरीश आहूजा के अनुसार शनि की साढ़ेसाती और शनि की ढय्या में व्यक्ति को अपनी गलतियां सुधारने का समय शनि देव देते हैं।

उनका पश्चाताप यदि वे समय रहते कर लें तो शनि देव उनको थोड़ी पीड़ा देकर माफ कर देते हैं। 20 जनवरी से शनि देव मकर राशि में चल रहे हैं यहां यह ढाई साल तक रहेंगे। आने वाले 2 साल में शनि देव सभी भारतीयों को भौतिक मोह से ऊपर ले आएंगे। सभी देशवासियों को कर्म की भट्टी में तपना और सोना बनकर निखरना सिखाएंगे। आने वाले 2 साल में देश सुपर पावर की ओर बढ़ेगा।

इस बार शनि जयंती पर 4 ग्रह सूर्य, बुध, शुक्र अाैर चंद्र वृषभ राशि में होंगे और शनि के साथ गुरु मकर राशि में रहेंगे। इन ग्रहों के कारण देश में न्याय और धर्म बढ़ेगा। प्राकृतिक आपदाओं को और महामारी से जीतकर भारत विश्व गुरु के रूप में उभर जाएगा। मजदूर वर्ग और निचले स्तर पर काम करने वाले लोगों के लिए अच्छा समय शुरू होगा। शनि जयंती पर शनि देव को तेल अर्पण करने या तेल से उनका अभिषेक करने से शनि अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं। शनि देव के आशीर्वाद से अष्टम शनि का प्रकोप, शनि की ढय्या और साढ़ेसाती के अशुभ काल का भी अंत होता है।

वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपरी भाग में महादेव निवास करते

पंडित विकास शास्त्री ने बताया कि इस साल विशेष संयोग बन रहा है, जब जेठ अमावस के दिन शनि जयंती और वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। यह एक सुखद और लाभकारी संयोग है। इसलिए वट सावित्री पूजा का मुहूर्त पूरे दिन है। वट सावित्री व्रत में स्त्रियां त्रयोदशी से लेकर अमावस तक वट वृक्ष का पूजन करके 3 दिवसीय व्रत करेंगी। वट वृक्ष की पूजा होती है। वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपरी भाग में महादेव निवास करते हैं। यह व्रत स्त्रियों की सुख समृद्धि व सभी प्रकार के दोषों को दूर करने एवं पति, पुत्र आदि सुख सौभाग्य प्राप्ति के लिए विशेष फल देने वाला माना जाता है। शुभ मुहूर्त ब्रह्म बेला से रात 11 बजकर 8 मिनट तक रहेगा। दिन में किसी भी समय व्हाट देव सहित माता सावित्री की पूजा कर सकते हैं। उसके बाद 23 मई से 1 जून तक गंगा दशहरे का पर्व मनाया जाता है। इसमें 10 दिन तक गंगा स्नान का अत्यधिक पुण्य होता है।

ऊं शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप करें

लाॅकडाउन के कारण अगर तेल का अभिषेक संभव न हो सके तो शनि जयंती पर इमरती व तेल में तली वस्तुओं, श्रीफल भोजन आदि गरीब व्यक्तियों को बांट सकते हैं। इस दिन ऊं शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप तथा शनि स्ताेत्र का पाठ करना चाहिए। बाधाओं और कठिनाइयों से मुक्त जीवन जीने के लिए मजदूरों एवं गरीबों की सेवा करनी चाहिए।
शुभ मुहुर्त: अमावस्या तिथि शुरू 21 मई रात 9 बजकर 35 मिनट से व अमावस्या तिथि की समाप्ति 22 मई रात 11 बजकर 7 मिनट पर।