10 हजार श्रमिकों को रजिस्ट्रेशन कर भेजा, गुपचुप जाने वालों की गिनती नहीं, इंडस्ट्री-खेती पर असर

अम्बाला. लॉकडाउन के बाद शुरू हुए प्रवासी श्रमिकों को पलायन के दौर में अब तक 10,723 प्रवासी मजदूरों को स्वास्थ्य विभाग मेडिकल सर्टिफिकेट जारी कर चुका है। इनमें से ज्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेन या बसों से यूपी-बिहार भेजे जा चुके हैं। लॉकडाउन के पहले चरण में जिले में बनाए गए शेल्टर होम में 4,400 श्रमिकों को ठहराया गया था। बाद में पंजाब की ओर से पलायन बढ़ा। जो लोग गुप-चुप पैदल निकले गए, उनकी गिनती नहीं है।
नारायणगढ़-शहजादपुर से अभी तक 1,800 श्रमिकों को 35 बसों में यूपी और बिहार के श्रमिकों को भेजा जा चुका है। अभी 2 शेल्टर होम में श्रमिक में हैं।
मुलाना-बराड़ा से 75 बसों में 2,761 श्रमिक भेजे जा चुके हैं। 11 शेल्टर होम में अब भी 1,341 श्रमिक ठहरे हैं।
अब तक 4,992 प्रवासियों को 4 स्पेशल ट्रेन से भेजा जा चुका है। मंगलवार को 1296 यात्री भागलपुर रवाना हुए। 7 मई को कटिहार 1,188 श्रमिक, 8 मई को भागलपुर 1,320 और 11 को मुज्जफरपुर के लिए 1188 यात्री गए।

जिन्होंने संयम रखा, सिस्टम पर भरोसा किया, उनके लिए रेलवे की ये लाइन

जिन्हेें न सिस्टम का सहारा मिला और न संयम बरत सके, उनकी मजबूरी ये रेल लाइन

इंडस्ट्री के सामने

अम्बाला के परंपरागत साइंस व मिक्सी इंडस्ट्री पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि एक तो ज्यादा इकाइयां माइक्रो लेवल की हैं, दूसरे यहां स्किल्ड कर्मियों की जरूरत होती।
ज्यादा असर साहा इंडस्ट्रियल एंड ग्रोथ सेंटर व काला अंब की बड़ी इकाइयों पर पड़ेगा। इनमें फूड प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, मैटल, कपड़ा, प्लास्टिक की इकाइयां हैं, जिनमें प्रवासी श्रमिक अस्थाई या सीजनल काम करते हैं।
साहा इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन के प्रधान राजबीर चौधरी कहते हैं कि एसोसिएशन के सदस्यों ने लॉकडाउन में अपने स्टाफ व लेबर का पूरा ध्यान रखा। उनके यहां जो प्रवासी मजदूर फैक्ट्रियों में काम कर रहे थे, उनमें से कितने वापस चले गए, इसकी पूरी सूचना अभी नहीं है। क्योंकि अभी तक 40 फीसदी इंडस्ट्री ही शुरू हुई है और उनमें भी पूरी क्षमता से काम नहीं हो रहा।

खेती-बाड़ी पर

सबसे ज्यादा असर धान रोपाई पर पड़ सकता है। जिले में धान का रकबा करीब 85 हजार हेक्टेयर का है। धान रोपाई का 90 फीसदी काम प्रवासी लेबर करती है।

शहर पर
80 फीसदी से ज्यादा रिक्शा वाले प्रवासी हैं। इसके अलावा ठेलों व फड़ों पर इनकी काफी उपस्थिति है। ज्यादातर घरों में काम करने वाली मेड प्रवासी हैं। हालांकि इनमें से काफी संख्या में स्थाई तौर पर बस गए हैं। इनमें पलायन कम है।