अधूरे सपनों को समेटकर रेहड़ी पर 900 किमी का सफर

अम्बाला. कभी-कभी किसी की लाचारगी मन को इतना कचोट देती है कि उसे बयान करने के सही शब्द नहीं मिल पाते। कुछ ऐसा ही देखने को मिला कैंट बस स्टैंड के पास। दोपहर के 12:30 बजे थे। तापमान लगभग 39 डिग्री था। जीटी रोड पर रेहड़ी का चलाता 14 साल का बच्चा निकला।

रेहड़ी पर उसके पिता दयाराम, मां सुशीला देवी, मामा आशू, 12 साल का भाई और 8 साल की बहन थे। इन 5 सवारियों के साथ लुधियाना से समेटकर लाए सामान भी था। लगभग 2 क्विंटल के वजन से भरी रेहड़ी को मासूम टांगें कैसे खींच रही थी, ये देखना काफी कष्टदायक था।

जैसे ही भास्कर संवाददाता रेहड़ी के पास आए तो पिता दयाराम डरकर नीचे उतरा और बिना कुछ पूछे ही हाथ जोड़ते हुए कहने लगा, ‘बाबू जी हमें न रोकें। 900 किलोमीटर दूर यूपी के फतेहपुर जाना है। कोई साधन नहीं मिला, इसलिए रेहड़ी पर ही चल दिए। पंजाब में भूखे मरने से अच्छा अपने गांव चले जाएं।’ दया राम ने बताया कि हम सब बारी-बारी रेहड़ी खींच रहे हैं। इन सबके के बीच इस चिलचिलाती धूप में एक छोटा बच्चा गर्म कंबल के ऊपर चुन्नी की छांव लिए सो रहा था।
इनपुट : रवि प्रताप सिंह /फोटो राजेश कश्यप