संत महात्माओं का जन्मदिन नहीं प्रकट उत्सव सेवा रूप में मनाएं : पंडित दाऊजी महाराज

पानीपत. जैसा कि श्री अवध धाम मंदिर के संस्थापक व प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित दाऊजी महाराज ने बताया कि…
हमें श्रेष्ठ महापुरुषों महात्माओं और समाज में जो मार्गदर्शन की भूमिका सब कुछ त्याग करके निभा रहे हैं, उन महात्माओं का जन्म उत्सव हमें प्रेरणा के रूप में एवं उत्सव के रूप में सेवा के प्रकल्प के रूप में मनाना चाहिए ऐसा शास्त्र कहते हैं।
गीता मनीषी ज्ञानानंद महाराज का जन्म उत्सव प्रेरणा दिवस के रूप में हम सब सेवा के प्रकल्पओं के साथ उत्सव रूप में जरूरतमंदों की सेवा भूखे को आटा प्यासे को पानी। जिनके तन पर कपड़ा नहीं है उनको कपड़े देकर जो दवाई के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं उनको दवाई प्रदान करके। रहने के लिए जिनके पास स्थान नहीं है उनको स्थान देकर और जो प्रवासी अपने प्रदेश में जाने के इच्छुक हैं उनको अपने घर सम्मान पूर्वक भेजकर, ऐसे विभिन्न प्रकार के सेवा प्रकल्प के साथ हम संत महात्माओं का प्रकट दिवस मनाए। शास्त्रों में दिए गए जीवन के लिए मूल सिद्धांतों के हिंट दिए जाते हैं। यही काम इस कलयुग के अंदर भगवान ने संतो, ब्राह्मणों, महा पुरुषों एवं शास्त्रों के द्वारा हम सबको हिंट देकर बताया है। ताकि हम शास्त्रों के द्वारा दिए गए हिंट के द्वारा अपना जीवन यापन कर सकें।
धर्म संसद में कभी भी अन्याय नहीं होता
जो व्यक्ति संतों के द्वारा जीने के हिंट को समझ लेता है, उसको समाज में सेंटराें की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो संतो के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चल जाता है एवं शासक के आदेशों का पालन भी कर्तव्यनिष्ठ होकर मानता है। उसको कोई हंटर नहीं मार सकता। क्योंकि शास्त्रों में आया है कि शासक वही अच्छा माना गया है जो साहसिक निर्णय अपनी प्रजा के लिए ले क्योंकि साहसिक निर्णय लेने वाला शासक ही राष्ट्रहित की कल्पना कर सकता है। रोग को खत्म करने के लिए कड़वी दवा तो पीनी ही पड़ती है यदि हम दवा को कड़वी मानकर उसको नहीं पिएंगे तो समझो रोग हमारे भीतर घर कर जाएगा।

संत महात्माओं के दिखाए मार्ग पर चलें
जो व्यक्ति संतों के द्वारा जीने के हिंट को समझ लेता है, उसको समाज में सेंटराें की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो संतो के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चल जाता है एवं शासक के आदेशों का पालन भी कर्तव्यनिष्ठ होकर मानता है। उसको कोई हंटर नहीं मार सकता। क्योंकि शास्त्रों में आया है कि शासक वही अच्छा माना गया है जो साहसिक निर्णय अपनी प्रजा के लिए ले क्योंकि साहसिक निर्णय लेने वाला शासक ही राष्ट्रहित की कल्पना कर सकता है। रोग को खत्म करने के लिए कड़वी दवा तो पीनी ही पड़ती है यदि हम दवा को कड़वी मानकर उसको नहीं पिएंगे तो समझो रोग हमारे भीतर घर कर जाएगा।