5 दिनों में 5 घंटे भी नहीं सोई, यही सोचती रहती थी बेटा क्या कर रहा होगा

अम्बाला. 14 साल के बेटे काे 2 दिन से बुखार था ताे 2 मई को सिविल अस्पताल से दवाई दिलवाने गए। वहां उसका कोरोना सैंपल लिया गया। 4 मई की रात 9.30 सभी बैठकर टीवी देख रहे थे कि अचानक डोर बेल बजी। दरवाजा खोला तो पीपीई किट पहने दाे डॉक्टर खड़े थे। बोले-बच्चे को दोबारा टेस्ट करवाने के लिए लेने आए हैं। हम घबरा गए। बेटा राेने लगा कि मैं नहीं जाऊंगा। हमने भी साथ चलने काे कहा ताे डाक्टर्स ने कहा कि आप अपनी गाड़ी में आ सकते हैं। जैसे ही हम चेंज करके बाहर आए ताे देखा कि एंबुलेंस जा चुकी थी। हम सिविल अस्पताल पहुंचे ताे पता चला कि बेटे काे लेकर वहां आए ही नहीं। फिर पता चला कि बेटे काे मुलाना अस्पताल ले गए हैं क्याेंकि उसका टेस्ट पाॅजिटिव आया था। काेराेना पाॅजीटिव की बात से ताे दिल दहल सा गया। रात 10.30 जब हम मुलाना के लिए निकले, लेकिन रास्ते में ही हमें कह दिया गया कि आपकाे मिलने नहीं दिया जाएगा। बेटे से फोन पर बात हुई ताे वाे राेकर कह रहा था-मम्मी मुझे ले जाओ, डर लग रहा है। मैंने खुद के आंसू संभालते हुए कहा-घबराओ नहीं, डाक्टर्स आपका केयर करेंगे। घर लाैटे ताे देखा कि घर का पूरा एरिया सील कर दिया था। बेटा कभी भी हमसे दूर एक दिन भी नहीं रहा।

मैंने ताे उसे कभी स्कूल ट्रिप पर भी अकेले नहीं जाने दिया। पूरी रात हम साेए नहीं। कभी बेटे के रूम में जाकर उसके खिलाैने देखूं, कभी उसकी काेई याद जहन में आ जाए। अगले दिन सुबह 6.30 बजे डाॅ. विशाल काे फाेन किया ताे मैंने उनसे एक रिक्वेस्ट की कि प्लीज इसका हौसला बढ़ाते रहिएगा। हमें टेस्ट के लिए बुलाया गया। एक दिन बाद डॉक्टर का काॅल आया कि बेटे का माेबाइल भेज दें। मैंने देवर के हाथ माेबाइल और उसका जरूरी सामान भेज दिया। उसके बाद हर घंटे में बेटे से बात करके उसका हाल पूछती। ये 5 दिन हमारे लिए बहुत खौफनाक थे। हम साेए नहीं। मन में सबसे बड़ा डर था कि बेटा काेराेना पाॅजीटिव के साथ रह रहा है। हमें बताया गया कि बेटे काे 14 दिन के लिए आइसोलेशन में रखा जाएगा क्याेंकि दाे टेस्ट हाेंगे। मैं ताे घबरा गई बेटा कभी मेरे बिना साेया नहीं ताे वाॅर्ड में अकेला 14 दिन कैसे रहेगा। बेटा बहुत भाेला है। मैं रात काे 2 बजे भी काॅल करके देख लेती कि कहीं उसकाे बुखार हाे और वाे बता ना पा रहा हाे। जब फाेन नहीं उठाता ताे मुझे तसल्ली हाे जाती कि वाे साे गया। दाेबारा जब उसकी रिपाेर्ट नेगेटिव आई ताे दिल काे तसल्ली मिली। रविवार शाम काे जब डॉक्टर का काॅल आया कि बेटे काे डिस्चार्ज कर देंगे ताे खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बेटा अपने डाॅगी ब्रुनाे काे देखकर खुश हाेता है ताे सबसे पहले उसकाे नहलाया। बेटे का रूम साफ किया। शाम जब बेटा घर आया ताे दिल था कि उसकाे गले से लगा लूं लेकिन……।
अक्सर याद आती उसकी वाे बात: बेटा खाने का शाैकीन है। उसकाे हर 1 घंटे में भूख लगती थी ताे थाेड़ी-थाेड़ी देर में आकर कहता मम्मी कुछ बना दाे। मैं कहती कुछ नहीं बचा मेरी किडनी खा लाे। वाे हंसकर कहता चलाे अपनी किडनी खिला दाे। उसकी ऐसी नाॅटी बातें मुझे हंसा देती।
डाॅ. पूजा अरोड़ा, ग्लोबल रिसर्च ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर हैं