भारतीय सैनिक शाम सिंह ने 1 दिन पहले बगावत की सूचना कर्नल को लीक कर दी थी, अंग्रेजों ने उसे भी यातनाएं दी

अम्बाला. डॉ. यूवी सिंह ने भास्कर के लिए लिखा (लेखक एसडी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष रहे व इस विषय पर रिसर्च की।) इनफील्ड राइफलों में गाय व सुअर की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय सैनिक नाराज थे। सरेआम गुस्सा निकालने की बजाय 26 मार्च से 1 मई तक अंग्रेजों के बंगलों और उनके पिट्ठुओं के घरों में आग लगाने की 20 घटनाएं हुई। इन घटनाओं से ब्रिटिश अधिकारी हैरान-परेशान थे। शिमला स्थित कमांडर इन चीफ को इसकी जानकारी दी। स्टेशन कमांडर ब्रिगेड हैलिफेक्स छावनी में चौकसी बढ़ाई। फिर तय हुआ कि 10 मई 1857 दिन रविवार को जब अंग्रेज अधिकारी व उनके परिवार चर्च में प्रार्थना के लिए जुटेंगे तो उन्हें बंदी बना लिया जाएगा। लेकिन दुर्भाग्य से यह बात लीक हो गई। सारी योजना लीक करने वाला था 5वीं नेटिव इनफेंट्री में काम करने वाला शाम सिंह। जो अंग्रेज कर्नल फाेरसिथ के यहां काम करता था। उसने कर्नल को बताया कि चर्बी वाले कारतूस को हिंदू व मुस्लिम सैनिक धर्म पर आघात मानते हैं। अम्बाला छावनी और दिल्ली में खून की होली खेली जाएगी। 10 मई को अंग्रेज नई बनी अम्बाला की सेंट पॉल चर्च में प्रार्थना के लिए जुटेंगे तो चारों तरफ से घेर लिया जाएगा। भारतीय सैनिक 60वीं और 5वीं पैदल रेजिमेंट हथियारों पर कब्जा कर लेंगे। इस सूचना से कर्नल चौकन्ना हो गया। शहर के कोतवाल ज्वाला प्रसाद को बुलाकर शाम सिंह को बंदी बनवा दिया। यातना देकर सारे राज पूछ लिए गए।

9 मई को अंग्रेज अधिकारियों ने गुप्त मीटिंग कर निर्णय लिया कि साप्ताहिक प्रार्थना नई चर्च में नहीं बल्कि मॉल रोड पर पुराने सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च में ही होगी। शस्त्रागार व कोट पर भारतीय सैनिकों के साथ ब्रिटिश सैनिकों की भी ड्यूटी होगी। 10 मई को सुबह 9 बजे अम्बाला में 60 देसी पैदल सैनिक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया। अपनी बैरक छोड़ हथियारों पर कब्जा कर लिया और चर्च को चारों तरफ से घेर कर यूरोपियन को बंदी बना लिया। लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने आप को ब्रिटिश अधिकारियों और सैनिकों से घिरा हुआ पाया। उन्हें चेतावनी दी गई कि एक भी गोली न चलाएं और तुरंत शांतिपूर्वक अपनी बैरकों मैं लौट जाएं। 12 बजे 5वीं देसी पैदल सैनिक टुकड़ी ने भी विद्रोह कर दिया। एक टुकड़ी ने ब्रिटिश ट्रेजरी को घेर लिया लेकिन उन्हें भी अंग्रेज अधिकारियों ने चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें भी चेतावनी दी गई कि वापस अपने बैरक में लौट जाएं।
माफी का वादा कर 200 सैनिकों को फांसी या तोप से उड़ाया
बिना समय बर्बाद किए जनरल हेनरी बरनार्ड घटनास्थल पर पहुंचे और सैनिकों को बैरक में लौटने को कहा। ऐसी गलती दोबारा न करने की शर्त पर माफ करने की बात कही। हालांकि जनरल बरनार्ड ने जो वादा किया वो निभाया नहीं। 60वीं और 5वीं नेटिव इन्फेंट्री को डिसबॉन्ड कर दिया। 200 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। सैनिक रिपोर्ट के अनुसार 62 सैनिकों को फांसी दी गई, 125 सैनिकों को गोली मार दी गई और 9 सैनिकों को तोप से उड़ा दिया गया। सभी के नाम उपलब्ध नहीं। केवल 5 सैनिकों माेहन सिंह, काहन सिंह, रामप्रसाद बैरागी, श्याम दास व हरि अम्बाला के नाम रिकॉर्ड में है।

अम्बाला के 9 घंटे बाद मेरठ छावनी में बगावत हुई

सवाल यह उठता है कि क्रांति पहले मेरठ में हुई या अम्बाला से। इसका उत्तर स्पष्ट है कि मेरठ से 9 घंटे पहले अम्बाला से शुरू हुई। छावनी में शुरू होने वाली बंगलों व बैरकाें में होने वाली आगजनी की घटनाएं वास्तव में क्रांति का ही रूप था। अंग्रेजों ने इसे बड़ी कूटनीति से स्थानीय बनाने का प्रयास किया क्योंकि अम्बाला छावनी के रूप में बहुत महत्वपूर्ण था। पंजाब के किनारे होने के कारण दिल्ली व शिमला के रास्ते पर था। अम्बाला की क्रांति को नियंत्रण करना बेहद आवश्यक था और फिर मेरठ से 9 घंटे पहले होने के कारण निम्नलिखित टेलीग्राम पुष्टि करता है जो अम्बाला के डिप्टी कमिश्नर ने पंजाब के चीफ सेक्रेट्री को भेजा था।