देसी सैनिक दिन में गुप्त बैठकें करते थे, रात को अंग्रेज अफसरों व उनके पिट्ठुओं के घर जलते थे

  • उपलब्ध दस्तावेजों और रिसर्च के आधार पर डॉ. यूवी सिंह की यह रिपोर्ट…

अम्बाला. 1857 की क्रांति भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण घटना है। चर्बी वाले कारतूसाें ने असंतोष रूपी आग में घी का काम किया। उत्तर भारत के केंद्र अम्बाला छावनी ने इसमें अगुवाई की। 1856 के समाप्त होते-होते भारत की ब्रिटिश हुकूमत ने सेना के लिए नवीन तकनीक पर आधारित ब्राउन बेस के स्थान पर इनफील्ड राइफल्स को अपनाने का फैसला किया। यह लेटेस्ट तकनीक पर आधारित और मारक क्षमता व निशाने के लिए मशहूर हथियार था।
इन राइफल्स के कारतूस फोर्ट विलियम कोलकाता में बनाए जाते थे। जिनकी आपूर्ति भारतीय सेना के तीन बड़े सैनिक डिपो केंद्र में की जाती थी। जिनमें प्रमुख थे डमडम, अम्बाला और सियालकोट। ब्रिटिश कालीन युग में सरकार के पास एक अनुवाद विभाग होता था। जो महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में करता था। सेना की इस शाखा के अनुवादक ने नवीन इनफील्ड राइफल्स की विशेषताओं का अनुवाद करते हुए लिखा कि नवीन हथियार में इस्तेमाल होने वाले कारतूस में चिकनाई के लिए गाय, बकरी व सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है। यह तथ्य 22 जनवरी 1857 तक भारत की प्रमुख छावनी में जंगल की आग की तरह चल गई। ब्रिटिश सरकार ने हाउस ऑफ कॉमन की एक बहस में इसे स्वीकार किया था कि नवीन कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है

अम्बाला उत्तरी भारत की बड़ी छावनी
उस समय अम्बाला उत्तरी भारत की सबसे बड़ी छावनी थी। नेटिव इन्फेंट्री की अनेक टुकड़ी या एवं सैनिक दस्ते तैनात थे। यहां पर तीन मस्कटियर डिपो थे। यहां के सैनिक दस्तों व टुकड़ियों ने पंचायत करके यह फैसला लिया कि वो इन कारतूस का बहिष्कार करेंगे। किसी सैनिक ने इनका प्रयोग किया तो उसका बहिष्कार किया जाएगा। यहां बाहर की दूसरी छावनियाें व रेजिमेंट्स से सैनिक मस्कट के डिपो में फायरिंग का प्रशिक्षण लेने आए हुए थे। जब उन्हें यहां सैनिकाें की पंचायत के फैसले का पता चला तो बड़ी दुविधा में पड़ गए। उन सैनिकाें ने प्रशिक्षण डिपो के असिस्टेंट एडजस्टमेंट जनरल कर्नल बीर्च काे शिकायत दी। कर्नल ने केमिकल एक्सपर्ट डॉ. मैकन मैरा के सहयोग से सैनिकों को समझाने की कोशिश की। सैनिक असंतोष की जानकारी कर्नल बिर्च ने कमांडर इन चीफ जनरल एनसन तक पहुंचाई। जनरल एनसन से सैनिकों को फटकार लगाते हुए कहा-मैं इन मूर्खों की वजह से अपना मिशन नहीं छोड़ सकता। सैनिकाें के बीच में चलने वाली हरकताें काे अम्बाला के डिप्टी कमिश्नर फाेरसिथ को भी अवगत करवाया गया लेकिन डीसी ने भी इसे बहुत हल्के में लिया। 36 वी नेटिव इन्फेंट्री को सैनिक हवलदार काशीराम तिवारी और नायक जियालाल दुबे, जो जनरल एनसन की सुरक्षा में तैनात थे, जब वे अपने दोस्तों से मिलने बैरक में आए तो दूसरे सैनिकों ने उन्हें ताने मारे। अगले दिन उन्होंने अपनी व्यथा प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक कैप्टन मार्टिन न्यू को बताई। मार्टिन ने एक डीओ लेटर के माध्यम से कर्नल बिर्च असिस्टेंट एडजस्टमेंट जनरल को परिस्थितियों से अवगत करवाया कि सैनिकों में कुछ ठीक नहीं चल रहा।

अफसरों के समझाने पर हरबंस सिंह ने फायरिंग अभ्यास किया, उसी रात उसका घर जला
22 मार्च 1857 को जनरल एनसन ने मस्कटरी डिपो का निरीक्षण किया। सैनिकों के शक व संदेह को दूर करने का प्रयास किया। उन्हें एनफील्ड राइफल की ट्रेनिंग एवं फायरिंग में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए मोटिवेट किया। जनरल एनसन के सामने दो रास्ते थे। फायरिंग प्रशिक्षण को अस्थाई रूप से निलंबित कर दिया जाए या इस प्रशिक्षण केंद्र को तोड़कर अन्य स्थान पर शिफ्ट किया जाए। एनसन ने भारतीय गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को इसकी सूचना दी। लाॅर्ड कैनिंग ने टेलीग्राम से संदेश भिजवाया-न तो ट्रेनिंग को निलंबित करना चाहते हैं और न ही प्रशिक्षण केंद्र को शिफ्ट करने के पक्ष में है। गो अहेड एंड मोटिवेट द सोल्जर्स फॉर ट्रेनिंग। मोटिवेशन का यह परिणाम निकला की 36वीं नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक सूबेदार हरबंस सिंह फायरिंग के लिए तैयार हो गया और 26 मार्च को नवीन कारतूस से फायरिंग का अभ्यास किया। उसी रात उसके घर में किसी ने आग लगा दी।
दिन में सैनिक छोटे-छोटे दलों में गुप्त बैठकें करते और रात को आगजनी होती

मेजर मूरे ने इंक्वायरी कमेटी के सामने कहा था- उस समय सैनिक छोटे-छोटे दल में बैठकर गुप्त वार्तालाप करते रहते थे। उसी रात छावनी के दो स्थानों पर आग लगा दी गई, जिनमें लगभग 30 हजार रुपए का नुकसान हुआ। छावनी स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर हेलीफैक्स सजग हो गए और गश्त और रात्रि पहरा बढ़ा दिया। आम नागरिकों के छावनी में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। ब्रिटिश अधिकारी चा‌र्ल्स वैलेमी ने गुप्त बैठकाें का वर्णन दिया था। डिप्टी कमिश्नर कर्नल फोरसी ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यहां किसी भी बंगले या बैरक में रात को आग लगाना आम बात हो चुकी है। जॉइंट मजिस्ट्रेट कैप्टन हावर्ड ने यह स्वीकार किया कि इन आगजनी की घटनाओं में एक या दो व्यक्तियों का हाथ नहीं हो सकता बल्कि बड़े योजनाबद्ध तरीके से छावनी में आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा था।
26 मार्च से 1 मई तक 20 स्थानों पर आगजनी

  • 26 मार्च 1857 : 36 वें नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार हरबंस सिंह के घर को जलाने का प्रयास किया जो मस्कटरी डिपो से संबंध रखता था।
  • 15 अप्रैल 1857: मस्कटरी डिपो से यूरोपियन से संबंध रखने वाला छप्पर जला दिया गया
  • 15 अप्रैल 1857: 60वीं नेटिव इन्फेंट्री के घुड़सवार प्रशिक्षक बूचर के एक भाग में आग लग गई।
  • 16 अप्रैल 1857: 60 नेटिव इन्फेंट्री के घुड़सवार प्रशिक्षक बूचर के घर में आग लग गई। यूराेपियन इंफेंट्री की बैरक नंबर 9 काे जला दिया। 28वीं नेटिव इंफेंट्री के ऑफिस को जला डाला।
  • 17 अप्रैल : लेफ्टिनेंट विटिनस के बंगले में अाग, लेफ्टिनेंट वाॅकर के अस्तबल में अाग लगाने का प्रयास हुआ।
  • 19 अप्रैल : 60वीं रेजिमेंटल नेटिव इंफेंट्री लाइंस के लेफ्टिनेंट ग्रेगी के घर में अाग लगी। तीसरी रेजिमेंट के ऑफि़सर्स के अस्तबल में अाग लग गई। सूबेदार शिवनारायण का घर जल गया। पांचवीं रेजिमेंट नेटिव इंफेंट्री की लाइन के नजदीक पुलिस चाैकी, जाे जीटी राेड के पास स्थित थी उसमें भी अाग लग गई।
  • 20 अप्रैल : हवलदार व जमादार के घराें काे अाग लगाने का प्रयास किया गया। जाे 5वीं रेजिमेंट नेटिव इंफेंट्री लाइन अाैर दाेनाें मस्कटरी डिपाे से जुड़े थे।
  • 21 अप्रैल : 60वीं रेजिमेंट नेटिव इंफेंट्री के 6 घराें काे अाग लग गई। जाे उन सैनिकाें के घर थे जाे छुट्टी पर गए हुए थे।
  • 22 अप्रैल : 5वीं रेजिमेंट नेटिव इंफेंट्री मैस काे अाग लग गई। भेड़ाें के बाड़े काे अाग लगा दी गई क्याेंकि मीट के लिए प्रयाेग हाेता था। मेजर लैफटेंस के अस्तबल काे अाग लगाने का प्रयास किया गया।
  • 23 अप्रैल : नौवीं लांसर लाइंस घुड़सवार सेना के कैप्टन सांडर्स के घर काे अाग लगाने का प्रयास किया गया।
  • 25 व 26 अप्रैल : नाैंवे लांसर लाइंस के रेजीमेंट की प्रॉपर्टी काे नुकसान पहुंचाया गया। घुड़सवारी के प्रशिक्षक कैप्टन शाॅव के घर काे भी जलाने प्रयास किया गया।

(जैसा डॉ. यूवी सिंह ने भास्कर की रीतिका एस. वोहरा को बताया।)