मां को राजेश की वर्दी तो पिता को फोटो देख फूट पड़ती है अश्रुधारा

  • घर बनाने और बहन की शादी के लिए अपनी शादी की बात हर बार टाल देते थे नायक राजेश कुमार गोदारा
  • जल्दी लौटने की कहकर गया, फिर लॉकडाउन की वजह से छुट्‌टी टल गई और अब मुठभेड़ में आस हुई खत्म

पंजाब-हरियाणा की सीमा से सटे गांव राजराणा के नायक राजेश कुमार 4 मई को जेएंडके के हंदवाड़ा में हुई आतंकी मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। 29 साल के इस वीर ने तो मातृभूमि का कर्ज अदा कर दिया, मगर परिवार जिसने मजदूरी कर अपने तीन बेटों में से मझले बेटे राजेश को सेना में भेजा वह अब अकेला पड़ गया है। बेटे के जाने के दुख और खराब आर्थिक हालात से जूझ रहे शहीद के इस परिवार के सपने पल भर में टूटकर बिखर गए। मां सेना में नायक बेटे का सेहरा सजाए रह गई और बेटा भाइयों और पिता को आत्मनिर्भर बनाने का सपना दिल में लिए देश पर कुर्बान हो गया। अब इस परिवार के लिए इस दुख को भुलाना और बड़ी मुश्किल से आर्थिकता की पटरी चढ़े परिवार के तिनके की तरह टूटकर बिखरने को समेटना मुश्किल हो गया है। क्योंकि नायक राजेश के शहीद होने के बाद परिवार का कोई आर्थिक सहारा नहीं रहा।

वो आखिरी बोल-पापा! इस बार जल्दी घर आऊंगा
पिता राम सिंह गोदारा बताते हैं, बेटा राजेश इस बार छुट्टी काटकर यह बोलकर गया था कि पापा इस बार मैं जल्द आऊंगा। मगर उसके साथ गांव करंडी का भी एक नायक उसकी यूनिट में ही तैनात था जो पहले छुट्‌टी आया था। इसी दरमियान लॉकडाउन हो गया और वह जवान वापस ड्यूटी पर नहीं पहुंच पाया। इससे राजेश कुमार को छुट्टी मिलने में देरी हो गई। अगर लॉकडाउन न हुआ होता तो राजेश छुट्‌टी पर घर आ गया होता। जब बेटी की शादी थी तो हमारे पास पैसों की कमी थी तब राजेश ने हौसला दिया था कि पापा शादी में पैसे की फिक्र न करें। उसके इन्हीं शब्दों ने वर्षों से चेहरे पर मुस्कराहट भरकर पूरी जिंदगी की थकान को दूर कर दिया था। खुशी से बेटी की शादी कराई थी।
मां कहती हैं-अपने लिए कभी कुछ नहीं सोचा राजेश ने
आंखों में बेचैनी, वर्दी पर हाथ और लंबे दिनों से बेटे का घर लौटने का इंतजार कर रही मां के पलभर में सपने चूर हो गए। बेटे के गम में बेसुध मां बार-बार बेटे की वर्दी पर निगाह टिकाए बैठी रहती हैं कि शायद उसका बेटा आकर बोलेगा कि मां मैं छुट्‌टी काटने के लिए आ गया। शहीद नायक की मां बदामी देवी नम आंखों से बताती हैं कि सारी उम्र हम मेहनत मजदूरी करते रहे। बेटा भर्ती हुआ तो लगा खुशियां लौटने वाली हैं। घर ठीक नहीं था। बेटे को हमारी चिंता लगी रहती थी। उसने हमें सुख के दिन दिखाने के लिए पहले घर ठीक करवाया। जब भी उसे शादी करने को कहते वह बोलता मां पहले बहन की शादी हो जाए, फिर कहता-आपके लिए घर बनवा दूं, और अब उसे पिता व भाइयों को अपने खेत काम करते देखने की इच्छा थी। अपने लिए तो उसने कभी कुछ सोचा ही नहीं। उसे नहीं पता था कि जिसके सिर पर वह सेहरा बांधने की आस लगाए बैठी है, उसकी अर्थी भी उसकी बूढ़ी आंखों को देखनी होगी।
5 भाई-बहनों का सहारा था
आर्थिक तौर पर मजदूर परिवार से संबंधित राजेश अपने परिवार की उम्मीद था। सेना में भर्ती होने के बाद पहले अपनी छोटी बहन की शादी की। फिर गांव के मकान को पक्का करवाया तांकि बुजुर्ग मां-बाप सुख के दिन देख सकें। अब वह पिता व दोनों भाइयों को आत्मनिर्भर बनाने का सपना सजो रहा था। नायक राजेश के कहने पर ही उसके पिता ने डेढ़ एकड़ जमीन ठेके पर लेकर अपने दोनों बेटों सहित उस पर खेती शुरू की थी। मगर राजेश की शहादत ने उनके आत्मनिर्भर होने के हौंसले एक बार फिर पस्त कर दिए। क्योंकि राजेश ही परिवार का एक मात्र आर्थिक सहारा था, जिस पर पूरा परिवार निर्भर करता था। पिता राम सिंह के मुताबिक नायक राजेश कुमार ने प्राइमरी शिक्षा गांव के स्कूल में करने के बाद प्लस टू की शिक्षा गांव करंडी के सरकारी स्कूल से की और साल 2010 के दौरान उसने सेना में ज्वाइन किया। पढ़ाई के समय से ही राजेश कुश्ती के खेल में रुचि लेते स्कूल स्तर पर कई इनाम हासिल कर चुका था तो सेना में उसकी सलेक्शन जल्दी हो गई। परिवार के पांच भाई बहनों में राजेश मंझला था। इसी पर पूरा परिवार आश्रित था। दो भाई और पिता मजदूरी करते थे जो अब राजेश के कहने पर जमीन ठेके पर लेकर खेती करने लगे थे।
70 साल पहले हरियाणा फतेहबाद से आकर गांव में बसा था परिवार
करीब 70 साल पहले फतेहाबाद के साबरपुरा से राजराणा में आकर बसे राजेश के पिता राम सिंह गोदारा के पास अपनी कोई जमीन न होने के चलते लंबा समय उन्होंने खेतों में मजदूरी करते अपने बच्चों को पढ़ाया। मजदूरी कर व कर्ज उठाकर बड़ी बेटी गीता की शादी की। इस दौरान बेटे जवान होने लगे तो राम सिंह को लगा कि अब शायद उसके दिन फिरने वाले हैं। मजदूरी के साथ-साथ वह अपने या पड़ोसी गांव में एक से डेढ़ एकड़ जमीन ठेके पर लेकर खेती भी करने लगा। इसमें उसके दोनों बेटे देवी लाल व सुभाष चंद उसका हाथ बंटाते थे। बड़ा भाई देवी लाल भी अभी कुंवारा है।